9. परिवार को संपन्न ही नहीं सुसंस्कृत भी बनाएँ ।
From Spiritual India
धन निर्वाह की एक सर्वविदित आवश्यकता है, पर वह उतनी बड़ी नहीं है, जिसके उन्माद में प3गति की अन्यान्य आवश्यकताओ को पूरी तरह भुला दिया जाए । समग्र विकास ही वास्तविक विकास माना जाता है । यदि शरीर का एक अंग बहुत मोटा, बहुत फूला बन जाए, तो उपलब्धि नहीं, वरन बीमारी ही कहा जाएगा । इसी प्रकार परिवार की अर्थव्यवस्था तो ठीक हो, कितन्तु सदस्यों का स्वास्थ्य, स्वभाव, चिंतन-चरित्र लड़खड़ाने लगे और वे दुष्प्रवृत्तियो, दुर्व्यसनों के चंगुल में फँसते जाए, तो समझना चाहिए कि संकटों के, विग्रहों के बादल घरने में देर नहीं । ऐसी दशा में आर्थिक संपन्नता उन दुर्गुणों की वृद्घि में सहायक होगी । आग में तेल पड़ने की तरह वह भड़कने ही लगेगी । इससे तो वे गरीब नफे में रहते है, जो रोज कमाते और रोज खाते है । दुर्व्यसनों के लिये उनके पास न वक्त खाली रहता है और न फिजूलखरची की सुविधा ।
निर्वाह साधनों की तरह स्वास्थ्य भी एक महती आवश्यकता है । उसे वास्तविक और आधारभूत संपदा माना जाना चाहिये । इस लक्ष्य की प्राप्ति बहुमूल्य स्वादिष्ट व्यंजनों या पौष्टिक दवाओं के सहारे नहीं हो सकती । इस हेतु प्रकृति का अनुसरण करना पड़ेगा, इंद्रिय संयम बरतना पड़ेगा । आहार में ही नही, विहार में भी समग्र संयम का समावेश करना पड़ेगा । अधिकांश लोग आवश्यकता से अधिक मात्रा में अभक्ष्य पदार्थों का समय-कुसमय चर्वण करते रहते है । रसोईघर में क्या बने, किस प्रकार बने और उसे कौन कितनी मात्रा में, किस प्रकार खाए, इसकी सुव्यवस्था बना लेना घर को एक सुरक्षित किला बना लेना है । आहार, श्रम और दिनचर्या में सुव्यवस्था का नियमन एक ऐसा सिद्घान्त है, जिसका ठीक तरह परिपालन करते रहने पर स्वस्थ रहने की गारंटी मिल जाती है ।
अभिभावक उचित-अनुचित तरीकों से अपनी, परिवार की सम्पन्नता बढ़ाने में जुटे रहते है । इसी में वे अपना गौरव मानते है और वर्तमान तथा भविष्य को सुख-शांति से भरा-पूरा होने की कल्पना करते है, पर परिणामतः होता इससे ठीक विपरीत ही है । संपदा अनावश्यक मात्रा में होने पर अपतव्यय सूझता है । उसके बदले व्यसन और दुर्गुणों का पिटारा पल्ले पड़ता है । संपदा के बदले खरीदे गए दुर्गुण जीवन के साथ जोंक की तरह चिपक जाते है और खून पीते रहते है । संपन्नता विलासिता सिखाती है, आलसी, प्रमादी और अहंकारी बनाती है । इस यथार्थता क न समझ पाने वाले ही सोचते रहते है कि धन-वैभव ही सब कुछ है । उसकी बड़ी मात्रा हाथ लगने पर उसके बदले सुख-सुविधा के प्रचुर साधन जुटाए जा सकते है ।
परिवार को सुसंपन्न बनाने के लिये जितना प्रयत्न किया जाता है, उसकी अपेक्षा उसे सुसंस्कृत, सदगुणी बनाने का प्रयत्न किया जाए, क्योंकि यही संपदा है, जो जीवनभर साथ देती है । सदगुणी अपनों के बीच ही नहीं परायों के बीच भी सम्मान और सहयोग प्राप्त करता है । उसके कारण व्यक्तित्व का वजन बढ़ता है । किसी भी क्षेत्र में उसका बढ़ा-चढ़ा मूल्यांकन होता है । यही वह आधार है, जिसके कारण जनसाधारण का स्नेह, सहयोग और सदभाव पाया जाता है । जिसके पास यह उच्चस्तरीय पूँजी है, उसे निर्वाह के स्वल्प साधन रहते हुए भी आत्मसंतोष एवं लोकसम्मान की कमी नहीं रहती । जो इतना अर्जित कर सका, उसे सामान्य सुविधाओं के रहते भी ऐसा अनुभव नहीं होता कि वह दरिद्र है, दूसरे सुसंपन्नों की तुलना में उन्हें कम प्रसन्नता मिल रही है ।
परिवार को सुसंपन्न बनाने के व्यापक प्रचलन में हेर-फेर होना चाहिए । सोचा जाना चाहिए कि इस ललक को अतिशय मात्रा में पालने का दुष्परिणाम सामने आकर ही रहेगा । जितना निर्वाह के लिये नितांत आवश्यक है ,उतना ही कमाया जाए ताकि किसी को पूर्वजों की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाने, बैठे-ठाले दिन काटने की ललक न उठे । परिवार के हर सदस्य को यह सोचने देना चाहिये कि उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है, स्वावलंबी बनना है । सही बात भी यही है । संसार के हर प्रगतिशील को सदगुणों की पूँजी ही आरंभ से अंत तक काम देती रही है । उसी के सहारे अपने को समर्थ, सुयोग्य, प्रमणिक और सम्मानित बनने का अवसर मिलता रहा है । वैभव का अतिशय महत्व समझने-समझानेसे किसी का भी हित साधन नहीं होता । दूरदर्शिता की तनि भी कमी रही, तो उसका सदुपयोग नहीं बन पड़ता । वैभव की सनक में आमतौर से लोग व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश करने की आवश्यकता को समझ नहीं पाते और वैबव के साथ-साथ दुर्गुणों का जखीरा जमा करते जाते है ।
विलासिता मनुष्य को स्वप्नदर्शी बनाती है । वह वर्तमान की तरह भविष्य को भी सदा सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा रहने की आशा करता रहता है । जबकि सही बात यह है कि प्रतिकूलता की हवा बहने लगने पर वह ताश का बना काल्पनिक महल देखते-देखते धराशायी हो जाता है । तब तक समय निकल चुका होता है और नए सिरे से सदगुणों की संपदा अर्जित कर सकना कठिन हो जाता है ।
शिल्प, संगीत, साहित्य, कला-कौशल अर्जित करने के लिये जिस प्रकार दीर्घकालीन और अनवरत अभ्यास करना पड़ता है । उसी प्रकार सदगुणों को स्वभाव का अंग बनाने के लिये, उन्हे दैनिक जीवन में भरपूर स्थान देने के लिये प्रयत्नरत रहना पड़ता है । आदतें देर में पकती है । वे हथेली पर सरसों जमाने की तरह न तो तुरत-फरत उपलब्ध होती है और न जमी हुई आदतों से पीछा छुड़ाना जल्दी से संभव हो पाता है । उन्हें योजनाबद्घ रुप से अपनाना और क्रमबद्घ रुप से व्यवहार में उतारना पड़ता है । परिवार के वरिष्ठों का ध्यान इसी केन्द्र पर केंद्रित रहना चाहिये । और उन्हें अपने परिजनों को सुसंस्कारी बनाने के लिये परिपूर्ण सतर्कता के साथ अनवरत प्रयत्न करना चाहिये । इस कार्य में अपना समय और परिश्रम लगाने में कृपणता नहीं बरतनी चाहिये ।
परिवार के हर सदस्य में सुव्यवस्था के लिये तत्परता बरतने की आदत होनी चाहिये । छोटे कामों से घृणा न करना, सुव्यवस्था को उत्पादक मनोरंजन मानना, खाली समय का उपयोग करना, आलस्य-प्रमाद को हावी न होने देना, काम को अधूरा न छोड़ना, सुसज्जा की अभिरुचि बढ़ाना जैसे अनेक ऐसे गुण परिवार में बढ़ते है, जो देखने में छोटे लगते है, पर इस प्रवृत्ति को पुनः प्रचलित करना चाहिये ।
