8. पारिवारिक उन्नति हेतु पंचशीलों का पालन ।
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परिवारों में कुछ सत्प्रवृत्तियों को विकसित और प्रचलित करने के लिये भी प्रयास किया जाना चाहिये । इस तरह की सत्प्रवृत्तियाँ पाँच प्रमुख है, जिन्हें पंचशील कहा गया है । भगवान बुद्घ ने मनुष्य जाति में अनेक वर्ग किए और इन वर्गों के लिए उनके कार्यक्षेत्र के अनुरुप पाँच-पाँच अनुशासन निर्धारित किए । शासन, समाज, धर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, उपार्जन आदि विभिन्न क्षेत्रों में निर्दिष्ट मर्यादाओं का पालन ही शील है, इनकी संख्या पाँच-पाँच निर्धारित की गई है, इसलिए उन्हें पंचशील कहा गया है ।
यहाँ पारिवारिक पंचशीलों को 1. सुव्यवस्था 2. नियमितता 3. सहकारिता 4. प्रगतिशीलता 5. शालीनता की पाँच सत्प्रवृत्तियों के रुप में समझा जा सकता है । इन्हें अपनाने से व्यक्ति, परिवार एवं समाज को उन विकृतियों से बचे रहने का लाभ मिलता है, जो समस्त समस्याओं और विपत्तियों के लिये उत्तरदायी है । इन्हें अपनाने से सर्वतोमुखी प्रगति का द्घार खुलता है और उज्जवल भविष्य के राजमार्ग पर चल पड़ने का अवसर मिलता है ।
