6. परिवार को सुसंस्कृत बनाने के कुछ सूत्र ।
From Spiritual India
स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, मनुष्य जब चाहे अपने छोटे से घरोंदें में दोनों में से किसी का भी अवतरण कर सकता है । रामायण में ऐसे पारिवारिक आदर्श का उल्लेख मिलता है । अयोध्या के निवासियों का पारिवारिक जीवन आदर्शों से ओत-प्रोत था । यदि हमारे पारिवारिक जीवन में ऐसा उदात्त भाव पाया जाता, तो परिवार संस्था क्यों छिन्न-भिन्न दिखाई पड़ती । रामायणकाल में पारिवारिक जीवन में जिन आदर्शों का पालन किया गया है, उसे राष्ट्रीय जीवन की सांस्कृतिक धरोहर कहा जाए, तो कोई अत्युक्ति नहीं । यदि उन विभिन्न पक्षों को अपने जीवन का केंद्र-बिन्दु मानकर चलें, तो परिवार में स्वर्गीय वातावारण का अवतरण कोई कठिन नहीं ।
परिवार के सदस्यों के बीच घनिष्ठ आत्मीयता एवं स्नेह-सदभाव के आधार पर परिवार को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है । जिस परिवार में संकीर्णता पनपती है, परिवार को विश्वखलित कर डालती है । अपने ही परिवार के सदस्यों में भेदभाव का होना एक ऐसी चिनगारी है जो भीतर-ही-भीतर जलाती रहती है । इन दिनों यह चिनगारी अधिकांश परिवारों में सुलगती देखी जा सकती है । आगे चलकर यही पारिवारिक विघटन का कारण बनती है ।
पारिवारिक सदस्यों में जब तक समर्पण, त्याग, उत्सर्ग का भाव बना रहता है, तब तक उसकी सुदृढ़ एकता पर आँच नहीं आने पाती । परिवार में रहने वाला प्रत्येक सदस्य कर्तव्यों को प्रधान और अधिकारों को गौण माने, अपनी नहीं दूसरों की सुख-सुविधा को प्राथमिकता दे, तो आपस में मन-मुटाव तथा विक्षोभ की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी । माता को त्याग की जीवंत प्रतिमा कहा जा सकता है । ऐसा त्याग भाव यदि कुछ अंश में भी परिवार के हर सदस्य में आ जाए, तो कलह-विग्रह की स्थिति उत्पन्न न हो ।
उदारता, सहिष्णुता का समावेश दैनिक जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलाप में रहना चाहिए । प्रत्येक सदस्य यह ध्यान रखे कि हमारे व्यवहार से किसी का अहित न हो । जाने-अनजाने में ऐसे कटु शब्दों का प्रयोग न हो, जो आपसी मन-मुटाव को जन्म दे । व्यवहार एवं वाणी में नम्रता, मधुरता, सौम्यता व शालीनता बनी रहे । परिवार में वाणी की मधुरता का यह प्रारंभिक अभ्यास आगे चलकर व्यक्ति के सामाजिक जीवन में भी बहुत उपयोगी सिद्घ होता है । यह नम्रता केवल अपने से बड़ों के प्रति ही नहीं हो, छोटों का हृदय भी मधुर व्यवहार द्घारा ही जीता जा सकता है । बच्चों को भी प्यार के साथ सम्मान की आकांक्षा रहती है । इसके अभाव में न तो उनमें आत्महीनता का भाव पनपता है या वे उददंड-उच्छृंखल बन जाते है ।
जहाँ भी चार-पाँच व्यक्तियों का संगठन हो, उनके स्वभाव, आदतों, विचारों में कुछ-न-कुछ भेद अवश्य पाया जाएगा । एक ही माँ-बाप की सगी संताने एक जैसी नहीं होतीं, हाथ की पाँचों अंगुलियाँ बराबर कहाँ होती है, पर सबके सामंजस्य-सहकार से ही कोई काम हो पाता है । हम यह चाहें कि सभी व्यक्ति हमारे अनुरुप हो जाएँ, तो यह कदापि संभव नहीं । इसके लिए तो दोनों ही पक्षों को कुछ-न-कुछ उदारता बरतनी होगी । ठीक यही बात पारिवारिक सदस्यों के लिए भी लागू होती है । प्रत्येक सदस्य के आपसी सामंजस्य पर परिवार की एकता व संगठन निर्भर करते है । स्वभावगत भिन्नता के कारण नई बातें खड़ी हो सकती है, लेकिन यदि दूसरे के व्यवहार से होने वाली असुविधा को हँसते-हँसते टाल दिया जाए या नम्रतापूर्वक उस गलती को बता दिया जाए, तो आपसी मन-मुटाव तो दूर एक-दूसरे की गलतियों में भी सहज सुधार होता रह सकता हैं । जहाँ अपनी गलती हो, उसे तुरन्त स्वीकार कर लेने में सामने वाले को कुछ कहने-सोचने का अवसर ही न मिलेगा । ये बातें लगती तो छोटी है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में इनका बड़ा महत्व है ।
बड़ों के प्रति सम्मान तथा श्रद्घा, छोटों के प्रति स्नेह तथा प्यार की अभिव्यक्ति ही पारिवारिक सुख-शान्ति का मेरुदंड है । बच्चों को यह शिक्षा आरंभ से ही दी जानी चाहिए कि वे बड़ों का सदा आदर करें । शालीनता एवं नम्रता उनके संस्कारों में घोलने के लिये प्रत्यक्ष एवं परोक्ष हर प्रकार के संभव प्रयास किए जाने चाहिए । इसमें एक कड़ी और भी जोड़नी होगी कि परिवार में जो बड़े है, उन्हें बच्चों की भावनाओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । उनकी भी कुछ मनोवैज्ञानिक कठिनाइयाँ और समस्याएँ होती है, जिनकी उपेक्षा करने पर उनके भीतर कुंठा एवं निराशा की भावना पनपती है ।
परिवार संस्था सहजीवन के व्यावहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है । इसीलिये कुटुंब समाज संस्था की इकाई माना जाता है । प्रत्येक सदस्य अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करने में अपनी प्रतिष्ठा, कल्याण, गौरव की भावना रखकर खुशी-खुशी उन्हें निबाहने का प्रयत्न करता है । कुटुंब के साथ सहजीवन में आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सदस्य अपने व्यक्तिगत सुख-स्वार्थों का त्याग करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है । यही सहजीवन की सर्वोपरि आवश्यकता होती है ।
