4. परिवार निर्माण से ही व्यक्ति और समाज का निर्माण संभव ।
From Spiritual India
परिवार निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से आत्मनिर्माण और समाज निर्माण के दोनं उद्देश्य अनायास ही पूरे होते चलते है । घर को तपोवन बनाने की बात कही जाती रही है । गृहस्थ को योग की संज्ञा दी जाती है । पतिव्रत, पत्नीव्रत, पितृ-सेवा, शिशु-वात्सल्य, समता, सहकार की सत्प्रवृतियाँ यदि सघन सदभावना की मनःस्थिति में संपन्न की जा सके त उसका महत्व योगाभ्यास एवं तप साधना से किसी प्रकार कम नहीं होता । इस प्रतिपादन में सहस्त्रों कथा-गाथाओं से इतिहास-पुराणों के पन्ने भरे पड़े है । कर्मयोग की जितनी उत्तम साधना गृहस्थ में हो सकती है, उतनी कदाचित ही अन्यत्र बन पड़े । इस प्रसंग में यह कहना भी अत्युक्तिपूर्ण नहीं है कि आत्मनिर्माण के लिये सरल और सार्थक साधना पद्घति परिवार निर्माण के रुप में ही प्रयुक्त हो सकती है ।
परिवार निर्माण की प्रतिक्रिया समाज निर्माण के रुप में होने की बात समझने में किसी विचारशील को कोई कठिनाई नहीं हो सकती । जिन महामानवों ने विश्व इतिहास में महती भूमिकाएँ सम्पन्न की है, उनके व्यक्तित्व सुसंस्कृत पारिवारिक वातावरण में ही ढले थे । निजी प्रतिभा का मूल्य स्वल्प और प्रभावी वातावरण की क्षमता महान है । प्रतिभाएँ कुसंस्कारी वातावरण में ढलती है, तो वे दुष्ट-दुरात्मा बनकर अपना और दूसरों का अहित ही करती रहती है । यदि उन्हें सुसंस्कृत परिस्थितियों में पलने-परिपक्व होने का अवसर मिला होता, तो निश्चय ही स्थिति सर्वथा भिन्न होती । परिस्थितियों ने जिन्हें डालकू बना दिया, यदि उन्हें दिशा और सहायता मिली होतीतो वह व्यक्ति किसी सेना का कुशल सेनापति अथवा साहसिक नेतृत्व कर सकने में पूर्णतया सफल सिद्घ हुआ होता । व्यक्ति की मौलिक प्रतिभा को कितना ही महत्व और श्रेय क्यों न दिया जाए, वातावरण के प्रभाव को झुठलाया नहीं जा सकता । कहना न होगा कि मनुष्य को प्रभावित करने वाली परिस्थितियों में सबसे अधिक सामर्थ्य परिवार के वातावरण में ही होती है ।
रस्सा और कुछ भी नहीं बिखरे हुए धागों का संयुक्त समुच्चय भर है । समाज और कुछ नहीं, परिवार में बसे हुए मनुष्यों का समुदाय मात्र है । व्यक्तियों का उत्पादन ही नहीं, परिपोषण और परिष्कार भी उसी में होता है । समाज जैसा भी कुछ है, पारिवारिक परंपराओं की देन है । समाज को जैसा भी कुछ बनाना है, वैसी परिस्थितियाँ परिवारों में उत्पन्न करनी होगी ।
किसी राष्ट्र की समृद्घि-सामर्थ्य, प्रतिभा एवं वरिष्ठता सरकारी दफ्तरों या अफसरों तक सीमित नहीं होती, वहाँ तो उसकी झाँकी मात्र मिलती है । छावनियों में रहने वाली सेना ही किसी राष्ट्र की शक्ति नहीं है, वास्तविक शौर्य, पराक्रम तो गली, मौहल्लों और घर-परिवारों में उगता और बढ़ता है । छावनियों में सेना उपजती नहीं, वह परिवारों से ही आती है । राष्ट्रीय समृद्घि तो परिवारों में कोष की नाप-तोल करना अपर्याप्त है । समृद्घि तो परिवारों में संचित रहती है । सरकार तो उन पर टैक्स लगाकर निचोड़ती भर है । राष्ट्रीय चरित्र का मूल्यांकन अफसरों को देखकर नहीं, नागरिकों के स्तर से किया जाता है । संत, ऋषि, महापुरुष, सुधारक, प्रज्ञावान, मूर्धन्य, कलाकार आसमान से नहीं टपकते । उन्हें आवश्यक प्रकाश पारिवारिक वातावरण तथा संपर्क में आने वाले सृजन परिजनों से ही उपलब्ध होता है । अन्न कोटों में भरा तो रहता है, पर उसका उत्पादन खेतों में होता है और खेत का हर पौधा उस संपदा को बढ़ाने में समर्थ सहभागी की भूमिका निभाता है ।
समाज निर्माण के लिये कुछ भी किया या कहा जाता रहे । आंदोलन और प्रचार के लिये किसी भी प्रक्रिया को क्यों न आपनाया जाए । प्रचारतंत्र और सृजन संस्थान का कितना ही बड़ा ढ़ाँचा खड़ा किया जाए, किन्तु वास्तविकता की आधारशिला परिवार के प्रचलन में सुधारात्मक प्रवृत्तियों के समावेश से ही संभव हो सकेगी । जड़ को सींचे बिनापत्ते-पौधे और उघान को सुम्य बनाने में अन्य उपाय आधे-अधूरे ही बने रहेंगें । वृक्षों को खुराक तो जड़ों से मिलती है । समाज का अक्षयवट अपना परिपोषण परिवारों से उनमें व्यवस्थित क्रम से रहने वाले व्यक्तियों से ही प्राप्त करता है । अस्तु समाज निर्माँण की, समाज सुधार की बात सोचने वालों को उस महान आरोपण के लिये परिवारों की क्यारियाँ ही उर्वरता समपन्न बनानी होंगी । इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाए, उतना ही उत्तम है ।
गृहस्थ तप और त्याग का जीवन है । गृहस्थी के निर्वाह-पालन के लिये किये जाने वाला प्रयत्न किसी तप से कम नहीं है । कुटुंब का भार वहन करना, परिवार के सदस्यों के सुविधापूर्ण जीवन के साधन जुटाना, स्त्री, बच्चे, माता, पिता, अन्य परिजनों की सेवा करना बहुत कठिन तपस्या है ।
