2. परिवार निर्माण से अनेक समस्याओं का समाधान

From Spiritual India

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परिवार के सुसंस्कारिता का वातावरण बनाना प्रत्येक विचारशील, जागरुक और विवेकवान व्यक्ति का कर्तव्य है । इस संगठन में रहने और उसका लाभ उठाने का ही दृष्टिकोण यदि प्रत्येक व्यक्ति अपना ले तो परिवार संस्था का कोई महत्व नहीं रह जाता । यदि एक साथ रहने का नाम ही परिवार है तो लोग धर्मशालाओ, होटलों और रेल-मोटरों में भी एक साथ रहते है । उतने मात्र से ही इन स्थानों पर रहने वाले लोग परिवार के सदस्य नहीं बन जाते । परिवार एक साथ रहने वाले व्यक्तियों का नाम नहीं है । उसमें रहने वाले सदस्य एक दूसरे के प्रति घनिष्ठ आत्मीयता के सूत्र में बँधे रहते है । साथ रहने, एक चौके में खाने और एक दूसरे से बोल-चाल, बात-चीत, प्रेम-व्यवहार से सम्बन्ध रहने के अतिरिक्त भी स्वजन आपस में एक दूसरे के प्रति कर्तव्यों से बँधे रहते है । उन कर्त्व्यों की पूर्ति करते चलना परिवार में रहने की, परिवारीजन कहलाने की अनिवार्य शर्त है । नासमझ, अबोध और छोटे परिवार के बड़े सदस्यों के लिये अधिक है । छोटे बच्चों को तो कर्तव्य और दायित्वों की भाषा ही नहीं समझ पड़ती, फिर वे उन्हें पूरा कहाँ से कर सकेंगे । उन्हें कर्त्वय और दायित्व समझाना आगे की बात है । पहले तो यह आवश्यक है कि बड़े लोग स्वयं कर्तव्यपरायण तथा परिवार के प्रति उत्तरदायी बनें ।

यह उत्तरदायित्व परिवार के लोगों को संस्कारवान बनाने, उन्हें आदर्श और उत्कृष्ट व्यक्तित्व संपन्न बनाने के लिये किये गये जागरुक प्रयासों के रुप में ही पूरा किया जा सकता है । इन प्रयासों को कुशलता और तत्परतापूर्वक संपन्न किया जाए तो न केवल परिवार उत्कृष्ट व्यक्तियों क उत्पन्न करने में समर्थ हो सकेगा, वरन उन प्रयासों के द्घारा अगणित मानवीय समस्याओं का समाधान भी परिवार की परिधि में रहकर ही संभव हो सकता है । सामाजिक कुरीतियाँ और समस्याएँ कोई आसमान से नहीं टपकती, वे समाज की इकाई व्यक्तियों की प्रवृत्ति से ही जन्मती है । व्यक्ति यदि असंस्कृत, अदूरदर्शी और विवेकवान होंगें, तो उनकी प्रवृत्तियँ, गतिविधियाँ और क्रियाकलाप भी उसी स्तर के होंगें । व्यक्तियों की गतिविधियाँ और उनके क्रियाकलाप ही कई तरह की सामाजीक समस्याएँ खड़ी करते है । यदि उनके दृष्टिकोण और रीति-नीति में कोई परिष्कार किया जाये, तोउन समस्याओं का जड़-मूल से उच्छेन किया जा सकता है ।

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