1. परिवार निर्माण – एक जीवन साधना

From Spiritual India

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कौशल को निखारते के लिये कार्यक्षेत्र चाहिए । वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला की, पहलवानों क व्यायामशाला की, डाँक्टरों को अस्पतालों की, अध्यापकों को पाठशाला की, शिल्पी को कारखाने की आवश्यकता पड़ती है । साधना का उद्देश्य है – आत्मपरिष्कार । अध्यात्म – साधना एवं जीवन-साधना का अभ्यास कहाँ किया जाये, इसके लिये दो स्थानों की आवश्यकता है, एक पूजा कक्ष, दूसरा प्रयोग क्षेत्र । प्रयोग क्षेत्र की दृष्टि से परिवार ही सर्वसुलभ है । पूजा – प्रार्थना से अंतरंग और स्वाध्याय – सत्संग से बहिरंग सत्प्रेरणाएँ प्राप्त होती है । उन्हें कार्यक्रम में परिणत करने और अभ्यास में उतारने की भी आवश्यकता है । उपासना के बीजारोपण को खाद—पानी न मिलने से उसके सूखने और मुरझाने की ही आशंका बनी रहेगी ।

परिवार की प्रयोगशाला में अपने निज के तथा समस्त प्रियजनों के गुण, कर्म, स्व्भाव परिष्कृत करने का अभ्यास क्रम आरम्भ किया जाए, तो उससे दोहरा लाभ है, भौतिक भी और आध्यात्मिक भी । भौतिक इस अर्थ में कि समस्त परिजनों को अपने व्यक्तित्व को सुविकसित करने के रुप में एक महान उपलब्धि का लाभ मिलता है । यह उपलब्धि इतनी बड़ी है कि उसे कुबेर की संपदा से भी बढञकर माना जा सकता है । उस परिष्कृत वातावरण में रहने वाले सभी लोग सामान्य परिस्थितियाँ रहने पर भी असामान्य प्रसन्नता अनुभव करते है और हँसते-हँसाते प्रगति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते है । तपोवनों में घर बनाने की अपेक्षा घरों को तपोवन बनाया जाये । सत्प्रवृत्तियों के अभिवद्गर्न की साधना जितना सरलतापूर्वक घर-परिवार में हो सकती है, उतनी अन्यत्र नहीं ।

परिवार की प्रारम्भिक आवश्यकता तो रोटी, कपड़ा और मकान की होती है । इसके बाद शिक्षा, चिकित्सा, आतिथ्य, रीति-रिवाजों के निर्वाह और आपत्तिकालीन स्थिति का सामना कर सकने वाली सामर्थ्य भी रखनी होती है । यदि जीवनयापन के लिये आवश्यक सामान्य ज्ञान और लोक व्यवहार का अनुभव हो, तो मनुष्य को जितनी बुद्घि मिली है और कलाइयों में जो क्षमता है, वह इसके लिये पर्याप्त है कि किसी सामान्य परिवार का गुजारा किसी प्रकार हँसी-खुशी के साथ होता चला जाये ।

कठिनाई तब आती है, जब परिवार के सदस्यों में स्नेह–सौजन्य का, सदभाव-सहयोग का अभाव रहता है । एक-दूसरे में रुचि नहीं लेते, अपने-अपने मतलब में चौकस रहते है, अनुशासन नहीं मानते और परस्पर मनोमालिन्य रखकर समय-कुसमय लड़ते-झगड़ते रहते है । जहाँ यह स्थिति होती, वहाँ अर्थ साधन रहते हुए भी परिवार एक ऐसे कैदखाने की स्थिति मेंहोगा, जहाँ विवशतापूर्वक समय काटना पड़ता है । ऐसी स्थिति में परिवारों में न घनिष्ठता रहती है, न आत्मीयता । ऐसी निरानंद स्थिति मं दिन तो कटते रहते है, पर वह उपलब्धियाँ जो इस पवित्र संस्था के सदस्यों को मिल सकती थी, प्राय नहीं मिल पाती । आज के अधिकांश परिवारों की स्थिति ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण बनी हुई है ।

छोटे-छोटे परिवारों की अपेक्षा बड़े परिवार बनाने की संयुक्त परिवार प्रथा लाभप्रद है, किन्तु उनकी उपयोगिता इसी शर्त पर है कि उसमें परस्पर सघन सदभाव और परिपूर्ण सहयोग का वातावरण हो । यदि द्घेष-दुर्भाव की, अवज्ञा और उपेक्षा की, आपाधापी की दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हो, तो घर को नरक बनाने की अपेक्षा यही अच्छा है किलोग अपना-अपना परिवार लेकर अलग हो जाये । सदभाव की स्थिति में संयुक्त परिवार का लाभ है और दर्भाव पनपने की स्थिति में उसका बिखर जाना ही क्षेयस्कर है । बड़े-बूढ़ों को एक पक्ष का अनावश्यक आग्रह नहीं करना चाहिए और स्थिति के अनुरुप संयुक्त परिवार को बनाए रखने की तरह ही उसे शांति सदभावपूर्वक अलग करने में भी सहायता करनी चाहिये ।

परिवार संस्था की सफलता उसकी भावनात्मक स्थिति और आदर्शवादी आचार संहिता पर टिकी हुई है । जब तक ये आधार बने रहेंगे, तब तक अभावग्रस्त घर-परिवारों में भी स्थिति ऐसी सुखद बनी रहेगी, जिन पर स्वर्ग न्यौछावर किया जा सके । शरीर की भूख रोटी, कपड़ा और मकान, अन्न, जल एवं हवा तक ही सीमित है, पर आत्मा की भूख स्नेह, सम्मान और सहयोग की परिस्थितियाँ मिलने पर ही बुझती है । बड़े छोटों का अधिक ध्यान रखें, तो वे बिगड़ने न पाएँगे । घर में स्वस्थ परंपराएँ डाली जाएँ । हर कोई क्षमनिष्ठ बने । बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी परिक्षमरत रहें । समय कोई बरबाद न करे । बड़ों का सम्मान छोटों को करना चाहिए, पर बड़ों को निठल्ले बैठे रहना और बात-बात पर हुक्म चलाकर छोटों का समय नष्ट करते रहना, अपना अधिकार नहीं मान लेना चाहिये । छोटों का कर्तव्य है कि बड़ों का सम्मान करें, पर बड़ों को भी इस दृष्टि से छोटों को अपने पीछे नहीं, आगे ही रखना चाहिये । बड़ों को संतुष्ट रखने के लिये उनका सम्मान करना, शिष्टाचार बरतना, आदरणीय संबोधन करना, नित्य प्रणाम करना, उसके शारीरिक कामों में सहयोग देना, कोई नया काम करते समय उनका आर्शीवाद लेना, उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना छोटों का कर्तव्य है । कई बार उनके विचार अनुपयुक्त, असामयिक एवं अवास्तविक होते है । ऐसे आदेश थोपते है जो मानने योग्य नहीं होते । कई बार वे घूँघट, छुआछूत, दहेज, धूमधाम में अपव्यय जैसी विकृत परंपराओं से चिपटे रहने का आग्रह करने लगते है । कई बार समाज-सेवा जैसे क्षेष्ठ कार्यों में अड़ंगा डालते है तथा स्वार्थवश केवल अपने काम-से-काम की सीख देने लगते है । इसलिये उचित-अनुचित की बात विवेक की कसौटी पर परखने के बाद ही किसी आज्ञा का पालन करना चाहिये । अनुचित आज्ञा की उपेक्षा की जा सकती है । हाँ उस अवज्ञा में भी नम्रता बनाए रखनी चाहिये ।

एक दूसरे का सहयोग करना परिवार की स्वस्थ परंपरा होनी चाहिये । बीमारी में सब सबकी पूछताछ करें और देखभाल, चिकित्सा, परिचर्या, सहानुभूति व्यक्त करने के लिये तत्परता बरतें । बड़े बच्चे छटों को पढ़ाया करें । बड़े-बूढ़े फालतू न बैठें, वरन छोटों को कहानियाँ सुनाने से लेकर उन्हें टहलाने, हँसाने, खेल-खिलाने, गृह-उघोग सिखाने, प्रश्नोत्तर से ज्ञानवृद्घि करने तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार पारिवारिक कार्यों में हाथ बटाने के लिये तत्पर रहें । निरर्थक समय गँवाते रहने की सुविधा को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएँ । मिलजुलकर काम करने की परम्परा पड़े । भोजन बनाने, सफाई रखने जैसे कार्यों का बोझ एक पर न डालकर उसमें अन्य लोग भी सहकार करें, तो उनकी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया बहुत ही अच्छी होगी ।

इन सिद्घान्तों के अनुरुप हमें अपने व्यक्तित्व ढालने चाहिए और परिवार में तदनुरुप परंपराएँ प्रचलित करनी चाहिये । ऐसे ही वातावरण में पल कर बच्चे सुसंस्कारी बनते है । अगली पीढ़ी को यदि उच्च शिक्षा दिला सकने की, उनके लिये संपत्ति छोड़ मरने की अपनी स्थिति न हो तो हर्ज नहीं, यदि उसे सदगुणी, सुसंस्कारी बना दिया गया है, तो निश्चिंत रहना चाहिये कि वे हर परिस्थिति में सुखी रह सकेंगे ।

गृहस्थ धर्म अन्य सभी धर्मों से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है । महर्षि व्यास के शब्दों में “गृहस्थ्येव हि धर्माणां सर्वेषां मूलमुच्यते” गृहस्थाश्रम ही सर्व धर्मों का आधार है । धन्यो गृहस्थाश्रमः चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है । जिस तरह समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते है, उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित है ।

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