स. सहकारिता
From Spiritual India
सहकारिता प्रगति का मूलमंत्र है । जहाँ भी वह सत्प्रवृत्ति जितनी मात्रा में अपनाई जाएगी, वहाँ उसी अनुपात में सदभावना की वृद्घि होगी, घनिष्टता बढ़ेगी । मिलजुलकर काम करने से काम का आनन्द भी बढ़ता है और स्तर भी । अधिक सुयोग्यों से सीखने और कम योग्यों को सिखाने का अवस तभी मिलता है, जब साथ-साथ काम करने की आदत डाली जाए ।
अधिक योग्यों को कम योग्यों की ज्ञानवृद्घि एवं प्रगति में स्थिति के अनुरुप सहायता करने का ध्यान रखना चाहिये । अधिक पढ़े, कम पढ़ों को पढ़ाया करें । छोटी आयु के, बड़ो के कामों में हाथ बँटाया करें । एकाकीपन दूर किया जाए । रिजर्व नेचर के अपने तक सीमित रहने वाले व्यक्ति या तो स्वार्थी बन जाते है या आत्महीनता की ग्रंथि से ग्रसित होकर अनपढ़, असामाजिक रह जाते है । अस्तु परिवार व्यवस्था के हर कार्य में सहकारी प्रयत्नों को यथासंभव अधिकाधिक स्थान दिया जाना चाहिये ।
