ल. शालीनता

From Spiritual India

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शिष्टता, सज्जनता, मधुरता, नम्रता और सदगुणों के समुच्चय को शालीनता कहते है । ईमानदारी, प्रमाणिकता, नागरिकता, सामाजिकता की मर्यादाओं को निष्ठापूर्वक अपनाना शालीनता का चिन्ह है । सामान्य शिष्टाचार की अपनी महत्ता है । दूसरों का सम्मान करने और अपने को विनम्र सिद्घ करने के लिये वाणी में मिठास और व्यवहार में शिष्टता का समावेश रहना चाहिये । उदारता, सेवा, सहायता की सत्प्रवृत्ति अपनानेसे ही दूसरों का स्नेह, सम्मान एवं सहयोग मिलता है । परायों को अपना बनाने की जितनी शक्ति शालीनता में है, उतनी प्रभोलन देकर फुसलाने तथा दबाव देकर विवश करने में भी नहीं है । इससे घर के हर सदस्य को परिचित एवं अभ्यस्त कराया जाना चाहिये ।

इन पारिवारिक पंचशीलों का किस घर में किस प्रकार अभ्यास किया जाए, इसका ऐसा नियम नहीं बन सकता, जो सब पर समान रुप से लागू हो, क्योंकि हर घर-परिवार के सदस्यों की स्थिति अलग-अलग होती है, अतः निर्धारण एवं क्रियान्वयन अवसर के अनुरुप ही किया जाना चाहिए । किन्तु सिद्घान्त रुप में परिजन कुछ मोटी-मोटी बातें ध्यान में रखकर चलें, तो परिजनों में वैसे सदगुण, वह सत्प्रवृत्तियाँ निश्चित रुप से बढ़ेंगी ही । उदाहरण के लिये व्यवस्था संबंधी अभ्यास के संदर्भ मे घर के बड़े सदस्यों को चाहिए कि वे छोटों को साथ लेकर चलें । स्वयं भी उस कार्य को करें और अन्य सदस्यों से भी कराएँ । स्वयं करने और दूसरों से कराने का सही तरीका यही है । दूसरों को निर्देश-परामर्श देना है तो अच्छा, पर आदतें बदलने और ढर्रे को मोड़ने में इतने भर से अभीष्ट उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता । आदर्श बदलने का तरीका एक ही है कि जो उपयुक्त है उसे क्रियात्मक रुप से अपनाने और व्यवहार में उतारने का प्रयत्न किया जाए । अभ्यास के लिये कुछ कार्यक्रम निर्धारित करने पड़ते है । बहुत समय तक उन्हें करते रहने से पुरानी आदतें छूट जाती है और नए निर्धारण स्वभाव का अंग बनकर अपने आप सामान्य जीवन क्रम का अंग बन जाते है ।

पारिवारिक पंचशीलों में जिन पाँच सत्प्रवृत्तियों का उल्लेख है, उनको परिजनों के स्वभाव का अंग बनाने के लिये ऐसी गतिविधियों को जन्म देना पड़ेगा, जिनके सहारे उन्हें परिजनों के स्वभाव का अंग बनाया जा सके । गृह संचालकों को समय की कमी का रोना नहीं रोना चाहिए । पैसा कमाना ही मात्र एक काम नहीं है । उतनेभर से परिवार के भरणपोषण की आवश्यकता तो पूरी हो सकती है, पर संसकारों का अभिवर्द्घन कहीं नहीं हो सकता । यदि समझ कामदे तो यह तथ्य स्वीकार करने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होगी कि गुण, कर्म, स्वभाव के समन्वय से बना हुआ व्यक्तित्व ही मनुष्य की वास्तविक पूँजी है । यह वैभव जिसके पास जितनी मात्रा में होगा, वह उसी अनुपात मे प्रभावशाली, संपत्तिशाली और सौबाग्यशाली बनेगा । अस्तु सच्चे अर्थों में परिजनों का हित चाहने वालों को उनके लिये साधन सुविधा जुटाने तक ही सीमित होकर न रह जाना चाहिए, वरन संस्कारों के संवर्द्घन का वह कार्य भी हाथ में लेना चाहिए, जो दूसरों से नहीं कराया जा सकता ।

यदि इन पाँचों विभूतियों से घर के प्रत्येक सद्स्य को अलंकृत करने का प्रयास चलता रहे, तो समय-समय पर वह उपाय भी सामने आते रहेंगे कि किसमें क्या कमी है और इस कमी को किस प्रकार पूरा किया जा सकता है । पंचशीलों से परिवार को भरने का प्रयत्न ऐसा ही है जैसा पाँच रत्नों के भंडार से घर को भरना और कुबेर से अधिक वैभववान बनना ।

गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है । भक्त, ज्ञानी, संत, महात्मा, महापुरुष, विद्घान, पंडित, गृहस्थाश्रम से ही निकल कर आते है । उनके जन्म से लेकर शिक्षा-दीक्षा, पालन-पोषण, ज्ञानवर्द्घन गृहस्थाश्रम के बीच ही होता है । परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि शिक्षा होती है ।

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