र. कुरीति उन्मूलन की समस्या

From Spiritual India

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सामाजिक कुरीतियाँ, अनुपयुक्त प3था-परंपराएँ, मूढ़-मान्यताएँ और रुढ़ियाँ, कितनी कष्टकर और कितनी खरचीली विभीषिकाएँ रचती रहती है, उसे हम सब आए दिन अनुभव करते है । घर-परिवार का भीतरी वातावरण इतना दुराग्रह अपनाए बैठा होता है कि बुद्घिमानी एक कोने में बैठी रहती है और रुढ़ियाँ क्रियान्वित होती रहती है । सुधार अभीष्ट हों, तो पत्ते तोड़ने से नहीं जड़ काटने से ही काम चलेगा ।

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