य. नागरिकता की शिक्षा

From Spiritual India

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नागरिकता और सामाजिकता की कारगर शिक्षा देना और शालीनता को स्वभाव का अंग बना देना, न प्रवचनों के हाथ में है और न साहित्य इस दिशा में बहुत आगे तक जा सकता है । इन प्रचार तंत्रों से दिग्दर्शन भर हो सकता है । सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना उपचारों से नहीं, अंतरंग के मर्मस्थल को प्रभावित करने वाली एवं दैनिक जीवन में कार्यान्वित होने वाली परिपाटी से ही संभव हो सकता है । यह महान कार्य यदि कभी कोई कर सकता है, तो वह एक ही तन्त्र होगा – परिवार का परिष्कृत वातावरण ।

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