फ. सहकारिता की समस्या
From Spiritual India
मिलजुल कर रहने, योग्यतानुसार कमाने, आवश्यकतानुसार खरच करने की आदर्शवादिता परिवार का मेरुदंड है । अध्यात्म की दृष्टि से अधिक लोगों का आत्मीयता के बंधनों में बँधना, सुख-दुख को मिल-बाँटकर वहन करना, अधिकार को गौण और कर्तव्य को प्रमुख मानकर चलना पारिवारिकता है । इसे सहकारी जीवन पद्घति कह सकते है ।
मानवी प्रगति में बुद्घि की प्रधानता को कारण समझा जाता है, पर वस्तुतः महिमा सहकारिता की है । कुटुंब बनाकर रहने और समाज व्यवस्था अपनाने से ही उसने इस स्तर तक पहुँचने में सफलता पाई है, जिससे वह सृष्टि का मुकुटमणि समझा जाता है । भौतिक-आत्मिक प्रगति का सारा रहस्य मिलजुलकर रहने की पद्घति में सन्निहित है । इसी सत्प्रवृत्ति को जीवनयापन के हर क्षेत्र में विकसित करना पारिवारिकता है । इसी का विकसित रुप समाजवाद एवं साम्यवाद है । आध्यात्म दर्शन भी इसी आस्था पर आधारित है । वसुधेव कुटुंबकम् का सिद्घान्त समस्त मानव समाज को प्राणिमात्र की आत्मीयता के सूत्र में बाँधता है और संयुक्त रुप से प्रगति करने तथा मिलबाँटकर खाने की प्रेरणा देता है ।
उदार दृष्टि से विचार करने पर तो यह पूरा विश्व ही अपना परिवार दिखाई देने लगेगा । स्वभावतः परिजनों को प्रगतिशील, समुन्नत, यशस्वी, समृद्घ एवं सुसंस्कृत होने की आकांक्षा रहती है । यह शुभेच्छाएँ मात्र कल्पना करने या आर्शीवाद देने से पूरी नहीं हो जाती । इन्हें फलित करने के लिये उस वातावरण को समर्थ बनाना पड़ता है, जिसमें पलकर किसी अनगढ़ को सुगढ़, अविकसित को समुन्नत बनने का अवसर मिलता है । जलवायु की अनुकूलता में वृक्ष वनस्पतियाँ विकसित और फलित होती है । प्रतिकूलता होने पर बहुमूल्य पौधे भी सूखते, दम तोड़ते देखे जाते है । यही बात प्राणियों के संबंध में भी है । समर्थ वर्ग के जीव-जन्तु भी अनुपयुक्त परिस्थितियों में दुर्बल रुग्ण रहते और अस्तित्व गँवाने लगते है । मनुष्य की आत्मसत्ता महान अवश्य है, किंतु उसको भी साँस लेनी पड़ती है । घुटन भरे घेरे में रहकर उसे अपनी स्वाभाविक चेतना से हाथ धोना पड़ता है । विष खाने से ही नहीं, विषाक्त गैस से भी मृत्यु होती है । वयक्ति के निजी दोष-दुर्गुण प्रगति पथ में जितना अवरोध उत्पन्न करते है, उससे कम नहीं कुछ अधिक ही बाधा उस वातावरण के कारण उत्पन्न होती है, जो परिवार में कुसंस्कारी परिस्थितियों के कारण बना होता है ।
निर्जीव निर्माण सरल है, सजीवों का उत्कर्ष कठिन है । वस्तुएँ जहाँ-की-तहाँ रखी रहती है । अपने मन से उलट-पुलट नहीं करती, पर सजीव प्राणी तो हर घड़ी कुसंस्कारिता का परिचय देने और नई-नई समस्याएँ उत्पन्न करने से नहीं चूकते । ऐसी दशा में प्राणियों का, विशेषतया मनुष्यों का भावनात्मक निर्माण कितना कठिन हो सकता है, इसे कल्पना से नहीं, अनुभव से ही जाना जा सकता है । शरीर-पोषण तो सरल है, पर बौद्घिक एवं भावनात्मक निर्माण करने के लिये असाधारण दूरदर्शिता और तत्परता अपनानी पड़ती है ।
परिवार निर्माण का प्रत्यक्ष पक्ष इतना ही है कि उस परिवार में रहने वाले प्रत्येक परिजन का वर्तमान सुखद और भविष्य उज्जवल बनता है । निर्माताओं को इसके बदले में आत्मसंतोष, गर्व-गौरव, श्रद्घा-सम्मान एवं यश-श्रेय प्राप्त होता है । फले-फूले उघान को लगाने-सजाने वाला माली, सामान्य श्रमिकों की तुलना में कुछ अधिक ही श्रेय और लाभ कमाता है । परिवार निर्माण में तत्पर मनुष्यों की उपलब्धियाँ किसी कुशल माली, भवन निर्माता, सफल उघोगपति, सरकस के रिंग मास्टर से अधिक ही आँकी जाती है, कम नहीं ।
