न. लोकसेवियों की पूर्ति

From Spiritual India

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प्राचीनकाल में हर घर के पीछे, एक व्यक्ति लोकसेवा के लिये समर्पित होता था । पारिवारिक संकीर्णता का दबाव इन दिनों इतना अधिक है कि कोई परमार्थ परायण होने की बात सोचे या कदम उठाए, तो उसे परिवार से लेकर मित्र-सम्बन्धियों तक के भारी विरोध का सामना करना पड़ता है । वानप्रस्थ और सन्यास की आवश्यकता घर के लोग अनुभव करने लगे, तो समझना चाहिये कि व्यक्ति और समाज का कायाकल्प प्रस्तुत करने वाला सतयुग स्वर्ग से उतर कर धरती पर आने के लिये तैयार हो गया ।

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