द. प्रगतिशीलता
From Spiritual India
भौतिक दृष्टि से आगे बड़ने और आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठने की प्रक्रिया को प्रगतिशीलता कहते है । मात्र महत्वाकांक्षाएँ गढ़ते रहने से कोई कुछ नहीं बनता । परिस्थितियों को ध्यान से रखकर ऊँची उड़ाने उड़ते रहने वाले, योग्यता एवं साधनों के अभाव में कुछ कर नहीं पाते । अतृप्त महत्वाकांक्षाएँ खीझ और निराशा ही पैदा करती है । अस्तु हवाई उड़ानें उड़ने से रोकना और प्रगति के लिये आवश्यक योग्यता बढ़ाने में ही हर परिजन को मनःस्थिति नियोजित करनी चाहिये । सफलताओं की लालसा तभी सार्थक है, जब उसके उपयुक्त परिस्थिति उत्पन्न करने के लिये प्रबल प्रयास किया जाए । इसके लिये योग्यता बढ़ाना भी आवश्यक है अन्यथा अक्षमता के रहते, मात्र परिश्रम से भी कुछ बड़ा प्रयोजन सिद्घ नहीं होता ।
इस संदर्भ में परिवार के सदस्यों को सुशिक्षित बनाने के लिये अध्ययन का, बलिष्ठ बनाने के लिये व्यायाम का, कुछ कमाने के लिये गृह-उघोगों का, शिल्प कौशलों का, गायन-वादन का चस्का लगाया जाए और उसके लिये साधन जुटाए जाएँ । वर्तमान स्थिति में अगले दिनों अधिक सुयोग्य बनाने के लिये अवसर मिल सके, इसके लिये जहाँ जो संभव हो, किया जाना चाहिये । संपदा की ललक कभी-कभी इतनी आतुर हो जाती है कि वह योग्यता बढ़ाने और पुरुषार्थ करने की अपेक्षा अनीतिपूर्वक संपदा-सफलता पाने के लिए मचलने लगती है । अस्तु महत्वाकांक्षाओं को योग्यता एवं सक्रियता बढ़ाने में नियोजित करने के लिये हर परिवार में कुछ-न-कुछ प्रयत्न चलना चाहिए । ऊँचे उठने और आगे बढ़ने के लिये कहाँ, किस प्रकार, क्या हो सकता है, इसको खोजने से उपयुक्त मार्ग निश्चित रुप से मिल जाता है ।
