आज के पूरे दिन की रचना
From Spiritual India
मैं सो रहा था गहरी नीन्द, साँई ने आकर जगा दिया मुझे।
तंद्रा भंग होने पर जब उठा मैं
मेरा सँसार बदल चुका था
मन में एक अद्भुत प्रसन्नता समा गई थी,
शरीर के रोम रोम में
एक विचित्र सहरन का अहसास हो रहा था।
मेरी समस्त मान्यताएं मेरी इच्छाएं, अभिलाषाएं,
मेरा जिन्दगी को देखने का दृष्टिकोण, मेरे ह्रदय के भाव
सब बदल चुके थे ओर लगने लगा,
मेरा जन्म फिर से हुआ है
प्रत्यक्ष माँ के उदर से नही, अदृष्य माँ की कृपा से
आज यँहा तक आ पहुँचा हूँ चलता-फिरता,
गिरता-उठता ठोकरें खाता।
एक अदृष्य हाथ आता है, मुझे स्नेह से उठा लेता है,
मेरे शरीर को झाड़ता पोंछता है और
आगे बढ़ने की प्रेरणा देकर चलता बनता है।
जीवन में क्या खोया, क्या पाया
न जानता हूँ ना जानने की इच्छा है।
मेरे मन में मेरे मस्तिष्क में
एक अद्भुत सा सकून बस गया है।
लगता है,
मेरी सब इच्छाऐं, सब तमन्नाएं पीछे कही छूट गयी हो
और मेरा 'मैं' खाली सा बैठा
अपने गन्तव्य के समीप आ पहुंचा है,
जिसे न सुख चाहिये न दुख,
न मृत्यु चाहिये न अमृत्व।
स्वर्ग ओर नर्क तो देखे ही किसने है।
यदि इच्छा नाम का कुछ बचा है
तो केवल,
परम शान्त मन से
अपने 'मैं' मे खोये रहने की और
उसी निर्विकल्प रूप रहित में
बैठे बैठे ही उस अनन्त मे मिल जाने की
न मेरा कोई निशान बचे, न मेरा नाम रहे;
नाम रहित रूप रहित 'मै'
अनन्त, अखण्ड, असीम में विलय हो जाऊं।
रमेश रामनानी
