अ. सुव्यवस्था
From Spiritual India
पंचशीलों में प्रथम है – सुव्यवस्था । अपने आपको, अपनी क्षमताओं को, साधनों को सुनियोजित सुव्यवस्थित रखने का नाम सुव्यवस्था है । असभ्य और अव्यवस्थित लोग न तो उपलब्ध साधनों का ही सदुपयोग कर पाते है और न कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त करने योग्य मनोयोग जुटा पाते है । साधन और अवसर अनेक को प्राप्त होते है । क्षमता और कुशलता भी बहुतों में होती है, पर वे उन्हें व्यवस्थित एवं क्रमबद्घ रुप से क्रियान्वित नहीं कर पाते । फलस्वरुप उन सफलताओं से वंचित रह जाते है, जिन्हें वे नियमन एवं नियंत्रण की बुद्घि होने पर सहज ही प्राप्त कर सकते है । सदगुणों में सबसे प्रमुख व्यवस्था ही है । महान कार्यों को संपादित करने और बड़ी सफलताएँ पाने वालों में व्यवस्था बुद्गि की विशेषता ही उन्हें श्रेयाधिकारी बनाती है । इसी के अभाव में पिछड़ापन लदा रहता है और पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ती है ।
वस्तुओं का सुंदर-सुसज्जित ढंग से यथाक्रम रखना, साथियों को उपयुक्त कामों में क्रमबद्घ रुप से लगाए रहना, साधनों को सँभालना और उन्हें उचित समय पर उचित कार्य में, उचित मात्रा में प्रयुक्त करना, उपार्जन और व्यय का संतुलन बिठाए रहना जैसे कौशल व्यवस्था बुद्घि के अंतर्गत ही आते है । आज की स्थिति और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार की नीति अपनाना, जिसमें कठिनाइयों से बचा जा सके और प्रगतिक्रम विधिवत चलता रहे, दूरदर्शी सूझ-बूझ का काम है । इस सदगुण को हर व्यक्ति के जीवनक्रम में समाविष्ट करने के लिये हर परिवार में आरम्भिक प्रशिक्षण और उनके परिपोषण का प्रबंध रहना चाहिये । स्मरण रखा जाए कि संसार में सबसे बड़ा पद व्यवस्थापक का है । यह कार्य घर-परिवार में वस्तुओं को स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखने के माध्यम से आरंभ किया जा सकता है ।
वस्तुओं की सुव्यवस्था का ही दूसरा नाम स्वच्छता है जो वस्तुओं को देखने में सुन्दर, सुसज्जित और नयनाभिराम बनाती है । इस प्रकार रखी हुई वस्तुएँ अपनी मौन भाषा में यह प्रकट करती है कि हम किन्हीं सभ्य सुसंस्कृत हाथों की छत्रछाया में रह रही है यह प्रतिष्ठा और गौरव की स्थिति है । जहाँ वस्तुएँ अस्त-व्यस्त, मैली-कुचैली, फटी-टूटी स्थिति में पड़ी हुई हो, तो समझना चाहिये वहाँ आलस्य और प्रमाद का साम्राज्य है । कुरुपता और अस्वच्छता एक ही बात है । सत्यं, शिवम्, सुंदरम् की प्राप्ति में प्रथम सौंदर्य, द्घितीय श्रेष्ठ और अंत में सत्य की प्राप्ति की क्रम है । प्राकृतिक सौंदर्य स्रष्टा का विधान है । मनुष्य दूसरा स्रष्टा है, वह वस्तुओं को स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखकर उन्हें सुंदर बनाए रहता है । सुसज्जा प्रकारांतर से स्वच्छता और व्यवस्थ का ही सम्मिलित स्वरुप है ।
